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Uttarakhand Election 2022: Pratapnagar Was Once Known As Lal Ghati, Dominated By The Communist Party – उत्तराखंड सत्ता संग्राम 2022: कभी लाल घाटी के नाम से जाना जाता था प्रतापनगर, था कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला

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प्रतापनगर क्षेत्र के धारकोट गांव निवासी कॉमरेड गोविंद सिंह नेगी उस दौर में सबसे अधिक प्रभावशाली नेता रहे। वह 1969 से 1982 तक भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से लगातार तीन बार टिहरी विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए।

टिहरी जिले में 60 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला था। विशेष रूप से प्रतापनगर क्षेत्र को लाल घाटी के नाम से जाना जाता था। कम्युनिस्ट आंदोलन के कई नेताओं का उस दौर में टिहरी जिले में अपना व्यक्तिगत प्रभाव था।

उस दौर में सबसे अधिक प्रभावशाली नेता रहे गोविंद सिंह नेगी
प्रतापनगर क्षेत्र के धारकोट गांव निवासी कॉमरेड गोविंद सिंह नेगी उस दौर में सबसे अधिक प्रभावशाली नेता रहे। वह 1969 से 1982 तक भारतीय कम्युनिस्ट से पार्टी से लगातार तीन बार टिहरी विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए। 1980 में सीपीआई के विद्या सागर नौटियाल देवप्रयाग से विधायक निर्वाचित हुए। पंचायतों में भी कम्युनिस्टों का खासा प्रभाव रहा है। हुकम सिंह भंडारी, बरफ सिंह रावत, रघुनाथ सिंह राणा कम्युनिस्ट पार्टी की अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। भंडारी प्रतापनगर, बरफ सिंह रावत और रघुनाथ सिंह राणा जाखणीधार के ब्लॉक प्रमुख पदों पर काबिज रहे।

1969 से 82 तक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे खुशहाल सिंह रांगड़, त्रैपन सिंह नेगी को चुनाव में करारी शिकस्त देते रहे। भले ही रांगड़ टिहरी से विधायक और नेगी टिहरी लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे हैं। सीपीआई के राज्य परिषद के सदस्य जय प्रकाश पांडेय ने बताया कि उस दौर में कम्युनिस्ट आंदोलन का अच्छा प्रभाव था। पार्टी में अधिकतर लोग प्रतापनगर क्षेत्र से थे। उनका जिले में खासा प्रभाव होने के कारण प्रतापनगर को लाल घाटी के नाम से जाना जाता था।

कुमाऊं में कभी दमखम से चुनाव लड़ती थी सीपीआई
कुमाऊं मंडल में कभी कम्युनिस्ट पार्टी की चुनावों में दमदार उपस्थिति रहा करती थी। भले ही पार्टी यहां से सीट न निकाल पाई हो लेकिन अल्मोड़ा, हल्द्वानी, नैनीताल सीट से कम्युनिस्ट पार्टी बहुत कम अंतरों से कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव हारी। विभाजन के बाद वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन कमजोर होता गया। धीरे-धीरे वोट बैंक सिकुड़ता गया। राज्य गठन के बाद भी वामपंथी पार्टियां खास प्रदर्शन नहीं कर पाईं। अब पार्टी कुछ ही विधानसभा क्षेत्रों में ही सिमट कर रह गई है।

उत्तराखंड सत्ता संग्राम: 2002 के चुनाव से आज तक इन मुद्दों ने पलटी कई सरकार, लेकिन सवाल फिर भी बरकरार

कुमाऊं में ऑल इंडिया कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना अल्मोड़ा निवासी पीसी जोशी ने की। वह आजादी से पहले ऑल इंडिया कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव पद पर रहे। मेरठ षडयंत्र में सरकार ने उन्हें अभियुक्त बनाया और वह जेल गए। 1952 में उत्तराखंड में कम्युनिस्ट पार्टी बनी और इसका मुख्य केंद्र अल्मोड़ा रहा। अल्मोड़ा में कम्युनिस्ट पार्टी बहुत मजबूत थी, हालांकि चुनावों में उसको मामूली अंतर से पराजय मिलती रही। नैनीताल और ऊधमसिंह नगर में भी कम्युनिस्टों का अच्छा प्रभाव था। पार्टी में विभाजन के बाद से वामपंथी पार्टियां कमजोर होती गई। आज दूसरे स्थान पर रहना तो दूर कई सीटों पर इनके उम्मीदवारों की जमानत भी नहीं बच पाती है। कम्युनिस्ट पार्टियों की ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है लेकिन वामपंथी पार्टियां इस जनाधार को वोटों में नहीं बदल पा रही हैं।

कम्युनिस्ट पार्टी में विभाजन से पहले कुमाऊं क्षेत्र से वामपंथी पार्टी का वजूद मुख्य विपक्षी दल के रूप में था। 1957 में ऑल इंडिया कम्युनिस्ट पार्टी के कॉमरेड लीलाधर पाठक, प्रेमानंद पांडे, मनोहर लाल ने हल्द्वानी में परिवहन उद्योग (रोडवेज) में वाहन कर्मचारी संघ और केमू में केएमटी वर्कर यूनियन बनाई। इन यूनियनों में कम्युनिस्ट पार्टी का वर्चस्व रहा। 1963 में कम्युनिस्ट पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। एक थी कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया दूसरी थी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी। 1969 में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी में भी विभाजन हो गया।

काशीपुर के कॉमरेड महेंद्र के नेतृत्व में मार्क्सवादी कम्यूनिस्ट पार्टी का एक धड़ा चारू मजूमदार के साथ गया और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी मार्क्सवादी लेनिन वादी बनाई। इस दौरान कम्युनिस्ट पार्टी ने मुख्यत: किसानों-मजदूरों में अच्छा काम किया और कई लोग कम्युनिस्ट पार्टी से जुड़े। कॉमरेड पीसी पांडे ने कम्युनिस्टों के आंदोलन से प्रभावित होकर अल्मोड़ा में पर्वतीय युवा मोर्चा का गठन कर जनवादी संगठन बनाया। 1977-78 में सीपीआईएमएल में चारू मजूमदार के खिलाफ विद्रोह हुआ। सत्यनारायण सिंह ने एक नई पार्टी का गठन किया। इस पार्टी ने संसदीय रास्ते पर जाने का निर्णय लिया। वहीं दूसरी पार्टी ने संसदीय चुनाव में जाने से इंकार कर दिया। इसी दौरान भाकपा माले, उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी का गठन हुआ।

उपस्थिति दमदार, लेकिन मिलती रही हार
विधानसभा चुनावों में वामपंथी दलों का प्रदर्शन कुछ सीटों पर बहुत अच्छा रहता था लेकिन वे इसे जीत में नहीं बदल सके। कम्युनिस्ट पार्टी के चंदन सिंह ने 1952 में अल्मोड़ा सीट से चुनाव लड़ा और वह कांग्रेस के हरिदत्त कांडपाल से मामूली वोटों के अंतर से हार गए। 1952 में नैनीताल सीट पर कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट पर दयाकिशन पांडे ने चुनाव लड़ा और वह करीब 500 से 700 वोटों से प्रजा सोशलिस्ट पार्टी के नारायण दत्त तिवारी से हार गए। उस वक्त दयाकिशन पांडे नगर पालिका हल्द्वानी के चेयरमैन थे। 1957 में उन्होंने दोबारा चुनाव लड़ा और फिर हार गए। इसके बाद वे दिल्ली चले गए। 1957 में कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट से हल्द्वानी सीट से हरीश ढौंडियाल ने चुनाव लड़ा। उन्हें भी अच्छे वोट मिले लेकिन वह चुनाव हार गए।1965 में हल्द्वानी सीट आरक्षित हो गई। कम्युनिस्ट पार्टी के टिकट से मनोहर लाल ने चुनाव लड़ा और वह कांग्रेस के इंद्रलाल से बहुत ही कम अंतर से हार गए। हल्दूचौड़, हल्द्वानी क्षेत्र में कम्युनिस्ट पार्टी का अच्छा प्रभाव होने के कारण उन्हें अच्छे वोट मिले। इनके अलावा भी अन्य सीटों से वामपंथी उम्मीदवार चुनावों में उतरे लेकिन जीत के नाम पर उनकी झोली खाली ही रही।

भाकपा (माले) हमेशा से मजदूर किसानों और शोषित वर्ग की आवाज उठाने का काम करती रही है। विधानसभा चुनाव न जीत पाने के बावजूद माले ने बड़े जनांदोलनों का नेतृत्व करते हुए जनता के पक्ष में बड़ी जीतें हासिल की हैं। बिंदुखत्ता भूमि संघर्ष हो या आशा वर्कर्स के शोषण का सवाल, किसान, मजदूरों के मुद्दे हों या सिडकुल में श्रमिक उत्पीड़न, प्रदूषण का सवाल, खत्ता वासियों के लोकतांत्रिक अधिकार या उत्तराखंड राज्य में जनविरोधी विकास के मॉडल का सवाल…भाकपा (माले) दृढ़ता से जनता के पक्ष में खड़ी रही और रहेगी। पार्टी आगामी राज्य विधानसभा चुनाव में जनता की आवाज को विधानसभा में पहुंचाने के लिए भाजपा को हराओ और वामपंथी विपक्ष का निर्माण करो नारे के साथ जाएगी।
-डॉ. कैलाश पांडेय, जिला सचिव भाकपा (माले)

वामपंथी पार्टियां जनता के मूलभूत मुद्दों पर लगातार संघर्षरत रहती हैं लेकिन चुनावी के समय अन्य राजनीतिक पार्टियों की ओर से ऐसा माहौल तैयार कर दिया जाता है कि इसमें मूलभूत मुद्दे गायब हो जाते हैं। राजनीतिक दल बाहुबल, धनबल आदि पर चुनाव लड़ते हैं और जनता को भ्रमित कर चुनाव जीत जाते हैं।
-बहादुर सिंह जंगी, जिला संयोजक अखिल भारतीय किसान महासभा

टिहरी जिले में 60 के दशक में कम्युनिस्ट पार्टी का बोलबाला था। विशेष रूप से प्रतापनगर क्षेत्र को लाल घाटी के नाम से जाना जाता था। कम्युनिस्ट आंदोलन के कई नेताओं का उस दौर में टिहरी जिले में अपना व्यक्तिगत प्रभाव था।

उस दौर में सबसे अधिक प्रभावशाली नेता रहे गोविंद सिंह नेगी

प्रतापनगर क्षेत्र के धारकोट गांव निवासी कॉमरेड गोविंद सिंह नेगी उस दौर में सबसे अधिक प्रभावशाली नेता रहे। वह 1969 से 1982 तक भारतीय कम्युनिस्ट से पार्टी से लगातार तीन बार टिहरी विधानसभा से विधायक निर्वाचित हुए। 1980 में सीपीआई के विद्या सागर नौटियाल देवप्रयाग से विधायक निर्वाचित हुए। पंचायतों में भी कम्युनिस्टों का खासा प्रभाव रहा है। हुकम सिंह भंडारी, बरफ सिंह रावत, रघुनाथ सिंह राणा कम्युनिस्ट पार्टी की अग्रिम पंक्ति में रहे हैं। भंडारी प्रतापनगर, बरफ सिंह रावत और रघुनाथ सिंह राणा जाखणीधार के ब्लॉक प्रमुख पदों पर काबिज रहे।

1969 से 82 तक कम्युनिस्ट पार्टी के नेता कांग्रेस के कद्दावर नेता रहे खुशहाल सिंह रांगड़, त्रैपन सिंह नेगी को चुनाव में करारी शिकस्त देते रहे। भले ही रांगड़ टिहरी से विधायक और नेगी टिहरी लोकसभा क्षेत्र से सांसद रहे हैं। सीपीआई के राज्य परिषद के सदस्य जय प्रकाश पांडेय ने बताया कि उस दौर में कम्युनिस्ट आंदोलन का अच्छा प्रभाव था। पार्टी में अधिकतर लोग प्रतापनगर क्षेत्र से थे। उनका जिले में खासा प्रभाव होने के कारण प्रतापनगर को लाल घाटी के नाम से जाना जाता था।

कुमाऊं में कभी दमखम से चुनाव लड़ती थी सीपीआई

कुमाऊं मंडल में कभी कम्युनिस्ट पार्टी की चुनावों में दमदार उपस्थिति रहा करती थी। भले ही पार्टी यहां से सीट न निकाल पाई हो लेकिन अल्मोड़ा, हल्द्वानी, नैनीताल सीट से कम्युनिस्ट पार्टी बहुत कम अंतरों से कांग्रेस और प्रजा सोशलिस्ट पार्टी से चुनाव हारी। विभाजन के बाद वामपंथी पार्टियों का प्रदर्शन कमजोर होता गया। धीरे-धीरे वोट बैंक सिकुड़ता गया। राज्य गठन के बाद भी वामपंथी पार्टियां खास प्रदर्शन नहीं कर पाईं। अब पार्टी कुछ ही विधानसभा क्षेत्रों में ही सिमट कर रह गई है।

उत्तराखंड सत्ता संग्राम: 2002 के चुनाव से आज तक इन मुद्दों ने पलटी कई सरकार, लेकिन सवाल फिर भी बरकरार

कुमाऊं में ऑल इंडिया कम्युनिस्ट पार्टी की स्थापना अल्मोड़ा निवासी पीसी जोशी ने की। वह आजादी से पहले ऑल इंडिया कम्युनिस्ट पार्टी के सचिव पद पर रहे। मेरठ षडयंत्र में सरकार ने उन्हें अभियुक्त बनाया और वह जेल गए। 1952 में उत्तराखंड में कम्युनिस्ट पार्टी बनी और इसका मुख्य केंद्र अल्मोड़ा रहा। अल्मोड़ा में कम्युनिस्ट पार्टी बहुत मजबूत थी, हालांकि चुनावों में उसको मामूली अंतर से पराजय मिलती रही। नैनीताल और ऊधमसिंह नगर में भी कम्युनिस्टों का अच्छा प्रभाव था। पार्टी में विभाजन के बाद से वामपंथी पार्टियां कमजोर होती गई। आज दूसरे स्थान पर रहना तो दूर कई सीटों पर इनके उम्मीदवारों की जमानत भी नहीं बच पाती है। कम्युनिस्ट पार्टियों की ट्रेड यूनियनों में अच्छी पकड़ है लेकिन वामपंथी पार्टियां इस जनाधार को वोटों में नहीं बदल पा रही हैं।

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