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Uttarakhand Election 2022: Old Cm Nityanand Swami And Youth Cm Pushkar Singh Dhami Develop The State – उत्तराखंड सत्ता-संग्राम: शिशु राज्य को बुजुर्ग सीएम ने संभाला, बालिग राज्य की कमान युवा मुख्यमंत्री के हाथ

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Uttarakhand Election 2022: आज उत्तराखंड युवा है। युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कंधों पर इस युवा प्रदेश को आगे बढ़ाने का जिम्मा है

उत्तराखंड की सत्ता का ताला खोलने के लिए एक प्रमुख चाभी युवा वोट बैंक की है। मौजूदा वक्त में युवा वोटरों की संख्या लगभग 57 फीसदी बताई जाती है। विचित्र संयोग है कि जब उत्तराखंड शिशु राज्य था, तब इसे संभालने की जिम्मेदारी बुजुर्ग मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के हाथों में रही। अब जबकि उत्तराखंड 21 साल का वयस्क राज्य हो चुका है तो बागडोर युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथों में है।

आज प्रदेश युवा हो रहा है। युवाओं के मुद्दे, उनकी राजनीति में पैठ और उनका बढ़ता वोट बैंक राजनीतिक पार्टियों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इस बदलते उत्तराखंड में भाजपा, कांग्रेस, आप सहित तमाम पार्टियां युवाओं को रिझाने की रणनीति तैयार कर रही हैं। निश्चित तौर पर विधानसभा चुनाव में पार्टियों के घोषणापत्रों में युवाओं के मुद्दे सुर्खियों में नजर आएंगे।

उत्तराखंड का सत्ता-संग्राम: गीत-संगीत और काव्य ने जलाई राजनीतिक चेतना की मशालें, पढ़ें ये खास रिपोर्ट

नित्यानंद स्वामी ने 73 साल की उम्र में अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी। उसके बाद 2002 में जब अंतरिम सरकार के बाद पहली बार सरकार चुनी गई तो एनडी तिवारी ने प्रदेश की कमान संभाली। उस वक्त उनकी उम्र 77 साल थी। उम्र के आंकड़े से भले तिवारी बुजुर्ग थे लेकिन उन्होंने शिशु उत्तराखंड के पालन-पोषण(विकास) में कोई कसर नहीं छोड़ी। भविष्य के उत्तराखंड को देखते हुए उन्होंने तमाम ऐसे फैसले लिए, जिनके लिए वह आज भी याद किए जाते हैं।

वक्त गुजरता गया। आज उत्तराखंड युवा है। युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कंधों पर इस युवा प्रदेश को आगे बढ़ाने का जिम्मा है। युवा मतदाताओं की संख्या भी पिछले चुनाव के मुकाबले इस साल ज्यादा है। उनके मुद्दे भी बेहद संवेदनशील और ध्यान देने योग्य हैं। लिहाजा, राजनीतिक पार्टियों के लिए इस बार के विधानसभा चुनाव में युवाओं को रिझाने की खास चुनौती है। माना जा रहा है कि पार्टियां युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर काम करने जा रही हैं।

करीब 57 फीसदी युवा बदलेंगे सियासत की तस्वीर
युवाओं के नजरिए से पिछले पांच साल में ही उत्तराखंड में कई बदलाव देखने को मिले हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 75 लाख 99 हजार 688 मतदाता थे। इनमें 18 से 39 आयु वक् के मतदाताओं की संख्या 42 लाख 85 हजार 621 थी। यानी प्रदेश में 2017 के चुनाव में 57.18 प्रतिशत युवा मतदाता थे। उस साल 18 से 19 साल के नए मतदाताओं की संख्या दो लाख 54 हजार 137 थी। आगामी चुनाव को देखते हुए मतदाताओं का आकलन करें तो प्रदेश में 78 लाख 46 हजार मतदाता हैं। इनमें इस बार 18 साल आयु पूरी करने वाले करीब 77 हजार नए मदाता शामिल हैं। राज्य में एक लाख 40 हजार नए मतदाता शामिल हुए हैं। सभी आंकड़ों के लिहाज से प्रदेश में इस बार भी युवा मतदाताओं की संख्या करीब 57 प्रतिशत होगी। पांच जनवरी को निर्वाचन विभाग अंतिम सूची का प्रकाशन करेगा।

बेरोजगारी: प्रदेश में लगातार बेरोजगारी दर बढ़ती जा रही है। कोविड आने के बाद से बेरोजगारी दर में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। लिहाजा, यह इस बार के विधानसभा चुनाव में युवाओं का सबसे बड़ा मुद्दा है।

शिक्षा: शिक्षा खासतौर पर उच्च शिक्षा की गुणवत्ता और मेडिकल कॉलेजों की बढ़ोतरी भी इस चुनाव में एक मुद्दा है। जैसे- अल्मोड़ा मेडिकल कॉलेज 2012 से आज तक शुरू नहीं हो पाया है। युवा लगातार इसके लिए आवाज बुलंद कर रहे हैं।

स्वरोजगार: वैसे तो स्वरोजगार को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने तमाम योजनाएं शुरू कीं लेकिन आज भी युवाओं के बीच स्वरोजगार का प्रोत्साहन अधूरा सा है। सरकारी औपचारिकताओं में उनके सपने दम तोड़ रहे हैं।

नई नौकरी, पुरानी पेंशन: 2005 के बाद प्रदेश में सरकारी नौकरी पाने वाले करीब 75 हजार युवाओं का मुख्य मुद्दा पुरानी पेंशन बहाली है। इसके लिए वह लगातार मांग कर रहे हैं।

खेल: प्रदेश में खेल नीति तो सरकार ने घोषित की है लेकिन आज भी खेलों का वातावरण, खेल मैदानों की कमी, सुविधाओं, संसाधनों की कमी का भी एक मुद्दा है।

नशाखोरी पर लगाम: प्रदेश में युवाओं के बीच तेजी से बढ़ता नशा भी एक अहम मुद्दा है। नशे की प्रवृत्ति की वजह से युवा वर्ग में असुरक्षा और अपराध पनप रहा है।

पलायन: अपने घर, अपने शहर में रोजगार की कमी युवाओं के लिए पलायन का सबब बनी हुई है। लिहाजा, पलायन इस चुनाव में भी युवाओं का मुद्दा है।

राजनीतिक दलों ने शुरू की रिझाने की कोशिशें
आगामी विधानसभा चुनाव के मद्देनजर युवाओं के मुद्दों पर राजनीतिक दलों ने रिझाने के प्रयास शुरू कर दिए हैं। भाजपा, कांग्रेस और आप इस दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रही है।
भाजपा: युवा मुख्यमंत्री के तौर पर कुर्सी संभालने वाले मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने 24 हजार नौकरियां देने का वादा किया। इसके लिए चयन करने वाली संस्थाओं को अधियाचन भी गए। इसके साथ ही भाजपा ने युवा प्रदेश, युवा मुख्यमंत्री, अबकी बार-60 पार का नारा देते हुए बड़े पैमाने पर युवाओं को अपने साथ जोड़ने का अभियान तेज कर दिया है।
कांग्रेस: कांग्रेस चुनाव संचालन समिति के अध्यक्ष एवं पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने वादा किया है कि अगर उनकी सरकार आती है तो वह दो साल के भीतर सभी खाली पदों पर भर्तियां करेंगे। इसके बाद जितने भी बेरोजगार बचेंगे, उन्हें हर महीने बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। कांग्रेस युवाओं को रोजगार, बेरोजगारी भत्ता और स्वरोजगार का सपना दिखाकर सत्ता में वापसी की कोशिश कर रही है।
आप: आम आदमी पार्टी ने वादा किया है कि वह सत्ता में आए तो एक साल के भीतर एक लाख युवाओं को नौकरियां देंगे। जब तक नौकरी नहीं मिलेगी, तब तक हर परिवार के एक युवा को पांच हजार रुपये प्रतिमाह के हिसाब से बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। रोजगार और पलायन के लिए अलग मंत्रालय बनाया जाएगा, जो इन दोनों महत्वपूर्ण विषयों पर काम करेगा।

सोशल मीडिया के जरिये युवाओं के बीच पैठ की होड़
भाजपा सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को आकर्षित करने का काम कर रही है।आम आदमी पार्टी ने भी सोशल मीडिया के जरिए युवाओं को ही फोकस किया है। कांग्रेस ने भी सोशल मीडिया से युवाओं को जोड़ने की कसरत तेज कर दी है।

विस्तार

उत्तराखंड की सत्ता का ताला खोलने के लिए एक प्रमुख चाभी युवा वोट बैंक की है। मौजूदा वक्त में युवा वोटरों की संख्या लगभग 57 फीसदी बताई जाती है। विचित्र संयोग है कि जब उत्तराखंड शिशु राज्य था, तब इसे संभालने की जिम्मेदारी बुजुर्ग मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी के हाथों में रही। अब जबकि उत्तराखंड 21 साल का वयस्क राज्य हो चुका है तो बागडोर युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के हाथों में है।

आज प्रदेश युवा हो रहा है। युवाओं के मुद्दे, उनकी राजनीति में पैठ और उनका बढ़ता वोट बैंक राजनीतिक पार्टियों का ध्यान आकर्षित कर रहा है। इस बदलते उत्तराखंड में भाजपा, कांग्रेस, आप सहित तमाम पार्टियां युवाओं को रिझाने की रणनीति तैयार कर रही हैं। निश्चित तौर पर विधानसभा चुनाव में पार्टियों के घोषणापत्रों में युवाओं के मुद्दे सुर्खियों में नजर आएंगे।

उत्तराखंड का सत्ता-संग्राम: गीत-संगीत और काव्य ने जलाई राजनीतिक चेतना की मशालें, पढ़ें ये खास रिपोर्ट

नित्यानंद स्वामी ने 73 साल की उम्र में अंतरिम सरकार की कमान संभाली थी। उसके बाद 2002 में जब अंतरिम सरकार के बाद पहली बार सरकार चुनी गई तो एनडी तिवारी ने प्रदेश की कमान संभाली। उस वक्त उनकी उम्र 77 साल थी। उम्र के आंकड़े से भले तिवारी बुजुर्ग थे लेकिन उन्होंने शिशु उत्तराखंड के पालन-पोषण(विकास) में कोई कसर नहीं छोड़ी। भविष्य के उत्तराखंड को देखते हुए उन्होंने तमाम ऐसे फैसले लिए, जिनके लिए वह आज भी याद किए जाते हैं।

वक्त गुजरता गया। आज उत्तराखंड युवा है। युवा मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के कंधों पर इस युवा प्रदेश को आगे बढ़ाने का जिम्मा है। युवा मतदाताओं की संख्या भी पिछले चुनाव के मुकाबले इस साल ज्यादा है। उनके मुद्दे भी बेहद संवेदनशील और ध्यान देने योग्य हैं। लिहाजा, राजनीतिक पार्टियों के लिए इस बार के विधानसभा चुनाव में युवाओं को रिझाने की खास चुनौती है। माना जा रहा है कि पार्टियां युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर काम करने जा रही हैं।

करीब 57 फीसदी युवा बदलेंगे सियासत की तस्वीर

युवाओं के नजरिए से पिछले पांच साल में ही उत्तराखंड में कई बदलाव देखने को मिले हैं। वर्ष 2017 के विधानसभा चुनाव में कुल 75 लाख 99 हजार 688 मतदाता थे। इनमें 18 से 39 आयु वक् के मतदाताओं की संख्या 42 लाख 85 हजार 621 थी। यानी प्रदेश में 2017 के चुनाव में 57.18 प्रतिशत युवा मतदाता थे। उस साल 18 से 19 साल के नए मतदाताओं की संख्या दो लाख 54 हजार 137 थी। आगामी चुनाव को देखते हुए मतदाताओं का आकलन करें तो प्रदेश में 78 लाख 46 हजार मतदाता हैं। इनमें इस बार 18 साल आयु पूरी करने वाले करीब 77 हजार नए मदाता शामिल हैं। राज्य में एक लाख 40 हजार नए मतदाता शामिल हुए हैं। सभी आंकड़ों के लिहाज से प्रदेश में इस बार भी युवा मतदाताओं की संख्या करीब 57 प्रतिशत होगी। पांच जनवरी को निर्वाचन विभाग अंतिम सूची का प्रकाशन करेगा।

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